जय हिन्द! जय भारत साथियों।
आज मैं आप सबसे एक ऐसे विषय पर बात करने वाला हूँ जो केवल रोचक ही नहीं, बल्कि राजनीति को समझने वाले हर व्यक्ति के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण भी है। यदि आप राजनीति के विद्यार्थी हैं, सामाजिक कार्यकर्ता हैं, चुनाव लड़ना चाहते हैं, किसी राजनीतिक दल से जुड़े हैं या भविष्य में देश और समाज का नेतृत्व करना चाहते हैं, तो यह विषय आपके लिए किसी मार्गदर्शक सिद्धांत से कम नहीं है।
आज हम एक ऐसी राजनीतिक विचारधारा को समझेंगे जो यह बताती है कि सरकारें आखिर बनती कैसे हैं, चलती कैसे हैं और गिरती कैसे हैं।
हम अक्सर सोचते हैं कि सरकार की सबसे बड़ी ताकत उसकी सेना, पुलिस, प्रशासन या कानून होता है। लेकिन क्या वास्तव में ऐसा है?
यदि केवल हथियारों के बल पर ही शासन चल सकता, तो इतिहास में कोई भी शक्तिशाली साम्राज्य कभी समाप्त नहीं होता। रोमन साम्राज्य, मुगल साम्राज्य, सोवियत संघ, ब्रिटिश साम्राज्य और दुनिया की अनेक शक्तिशाली सरकारें समय के साथ क्यों समाप्त हो गईं?
इसका उत्तर हमें स्कॉटलैंड के महान राजनीतिक दार्शनिक डेविड ह्यूम के प्रसिद्ध लेख “सत्ता में बने रहने का पहला नियम” में मिलता है।
ह्यूम का सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष यह है कि
“किसी भी सरकार की वास्तविक शक्ति हथियारों से नहीं, बल्कि जनता की राय (Opinion) से आती है।”
यही वह सिद्धांत है जिसने राजनीति को देखने का दृष्टिकोण बदल दिया।
सरकार की असली ताकत क्या है?
कोई भी सरकार केवल सेना, पुलिस या प्रशासन के बल पर लंबे समय तक शासन नहीं कर सकती।
सेना और पुलिस की संख्या हमेशा जनता से बहुत कम होती है।
यदि किसी देश की आबादी 100 करोड़ है, तो पुलिस और सेना की कुल संख्या कुछ लाख या कुछ मिलियन हो सकती है। फिर इतने कम लोग इतनी बड़ी आबादी पर शासन कैसे कर लेते हैं?
उत्तर बहुत सरल है,
क्योंकि अधिकांश लोग सरकार को वैध मानते हैं और उसकी बात मानने के लिए तैयार रहते हैं।
यही स्वीकृति सरकार की सबसे बड़ी ताकत होती है।
इसलिए सरकार की असली नींव जनता की राय होती है, न कि बंदूकें।
जनता किसी सरकार को वैध क्यों मानती है?
ह्यूम के अनुसार सरकार मुख्य रूप से दो प्रकार की राय (Opinions) पर टिकी होती है।
पहला:- जनहित की राय ।
जब लोगों को लगता है कि
सरकार देश में शांति और कानून व्यवस्था बनाए रख रही है।
नागरिक सुरक्षित हैं।
सीमाएँ सुरक्षित हैं।
व्यापार और रोजगार चल रहे हैं।
लोगों को आवश्यक सुविधाएँ मिल रही हैं।
सरकार जनता की समस्याओं को हल करने का प्रयास कर रही है।
तब जनता मानती है कि सरकार समाज के हित में काम कर रही है।
यही विश्वास सरकार को स्थिर बनाता है।
दूसरा:- शासन के अधिकार की राय।
दूसरा आधार उससे भी अधिक महत्वपूर्ण है।
जनता को यह विश्वास होना चाहिए कि
सरकार सही और वैध प्रक्रिया से सत्ता में आई है।
चुनाव निष्पक्ष हुए हैं।
संविधान का पालन किया जा रहा है।
सत्ता में बैठे लोग शासन करने के योग्य हैं।
सरकार कानून से ऊपर नहीं है।
जब जनता यह मानती है कि सरकार को शासन करने का नैतिक और संवैधानिक अधिकार प्राप्त है, तब सरकार को व्यापक स्वीकार्यता मिलती है।
सरकार कब कमजोर होने लगती है?
समस्या तब शुरू होती है जब इन दोनों प्रकार के विश्वास कमजोर होने लगते हैं।
यदि लोगों को यह लगने लगे कि
सरकार जनता के हित में काम नहीं कर रही,
न्याय नहीं मिल रहा,
शासन केवल कुछ लोगों के हित में चल रहा है,
या सरकार ने अपनी वैधता खो दी है,
तो धीरे-धीरे जनता का भरोसा टूटने लगता है।
यह बाद हमेशा ध्यान रखिए कि “सरकार पहले जनता के मन से गिरती है, उसके बाद सत्ता से जाती है”
जब लोगों का विश्वास समाप्त हो जाता है, तब सेना, पुलिस और प्रशासन भी उस विश्वास की कमी की भरपाई नहीं कर सकते।
इतिहास में अधिकांश बड़े राजनीतिक परिवर्तन पहले जनता की राय बदलने से शुरू हुए और बाद में सत्ता परिवर्तन हुआ।
जनता की राय ही सबसे बड़ी शक्ति है
लोकतंत्र में चुनाव जनता की राय व्यक्त करने का सबसे बड़ा माध्यम है।
लेकिन केवल लोकतंत्र ही नहीं, इतिहास बताता है कि राजशाही, तानाशाही और सैन्य शासन भी अंततः जनता की राय से पूरी तरह मुक्त नहीं रह पाए।
सरकारें लंबे समय तक तभी टिकती हैं जब उन्हें समाज के एक बड़े हिस्से का समर्थन प्राप्त रहता है।
राजनीतिक स्थिरता का आधार केवल कानून नहीं, बल्कि जनता का विश्वास होता है।
एक छोटा समूह भी बड़ा परिवर्तन ला सकता है
राजनीतिक आंदोलनों पर हुए कई अंतरराष्ट्रीय अध्ययनों से यह संकेत मिलता है कि यदि किसी देश की आबादी का अपेक्षाकृत छोटा लेकिन संगठित, अनुशासित और लगातार सक्रिय हिस्सा किसी मुद्दे पर शांतिपूर्ण ढंग से लामबंद हो जाए, तो वह सरकारों पर महत्वपूर्ण दबाव बना सकता है।
कई राजनीतिक वैज्ञानिकों के शोध में यह पाया गया कि अधिकतर ऐतिहासिक मामलों में जब लगभग 3.5% आबादी ने लगातार और व्यापक अहिंसक आंदोलन में भाग लिया, तो ऐसे आंदोलनों की सफलता की संभावना बहुत अधिक रही। यह कोई अटल नियम नहीं है, बल्कि अनेक ऐतिहासिक उदाहरणों पर आधारित नतीजों के आधार पर कहा जा रहा है।
इसका सबसे बड़ा संदेश यह है कि
संगठित, जागरूक और शांतिपूर्ण नागरिक समाज, किसी भी लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति होता है।
राजनीति का सबसे बड़ा सबक
हर राजनेता, हर राजनीतिक कार्यकर्ता और हर लीडर को यह समझ लेना चाहिए कि
लोग भाषणों से प्रभावित होते हैं।
लोग नारों से भी प्रभावित होते हैं।
लोग प्रचार से भी कई बार प्रभावित हो जाते हैं
परन्तु अंत में लोग अपने अनुभव से ही निर्णय लेते हैं।
यदि जनता को यह महसूस होता है कि सरकार उनके हित में कार्य कर रही है और उसे शासन करने का नैतिक अधिकार है, तो सरकार मजबूत होती है।
लेकिन यदि जनता का विश्वास टूट जाता है, तो सबसे शक्तिशाली सरकार भी धीरे-धीरे कमजोर होने लगती है।
निष्कर्ष
सत्ता की सबसे बड़ी ताकत सेना नहीं होती।
सत्ता की सबसे बड़ी ताकत पुलिस नहीं होती।
सत्ता की सबसे बड़ी ताकत धन नहीं होता।
सत्ता की सबसे बड़ी ताकत जनता का विश्वास होता है।
जिस दिन सरकार जनता का विश्वास जीत लेती है, उस दिन उसकी जड़ें मजबूत हो जाती हैं।
और जिस दिन जनता का विश्वास समाप्त हो जाता है, उसी दिन से सत्ता के पतन की उलटी गिनती शुरू हो जाती है।
आज हमने बात की सत्ता में बनें रहने के नियम के बारे में, आगे हम बात करेंगे कि जनता का विश्वास जीता कैसे जाता है? किन कारणों से जनता लीडर पर भरोसा करना छोड़ देती है? यदि जनता का भरोसा कम होने लगे तो क्या करें? कैसे सत्ता में लगातार बने रहने वाले राजनेता अपने खिलाफ बन रहे माहौल को अपने पक्ष में करते हैं? नए लोगों को किन बातों पर ध्यान रखना चाहिए। साथ ही साथ अलग-अलग विषयों पर असरदार भाषण कैसे देने हैं उसपर भी आगे विस्तार से चर्चा करेंगे।
जय हिन्द, जय भारत।